मेरे सपनों की धर्ती छितकुल
दोस्तो अपने बलाग का अागाज अपनी ड्रीम डेस्टीनेशन के सफर से करना चाहता हूं।उससे पहले मैं अपने बारे में संक्षेप सी जानकारी देना चाहता हूं।मेरा पूरा नाम हरजिंदर सिंह है अौर मैं एक अध्यापक हूं।मैं पंजाब के सबसे पछड़े जिले मानसा के सबसे पछड़े हूए गाँवों में से एक अनूपगढ़ में रहता हूं।मेरे गाँव के पूरे एतिहास में गिनती के अाठ दस लोग ही ग्रेजूएट हैं अौर उनमें से अापके भाई को गाँव का पहला ग्रेजूएट अौर पहला पोसट ग्रेजूएट लड़का होने का सुभाग प्रापत है।इस समय मैं अपने पड़ोसी गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ा रहा हूँ ।जब भी स्कूल में तीन चार छुट्टियाँ इकट्ठी अा जाएं तो मोटरसाइकिल लेकर पहाड़ों की अोर निकल जाता हूँ ।अगर कोई दोस्त साथ में जाना चाहे तो ठीक है नहीं तो अकेले चल पड़ता हूं।मैदानों में घूमना मुझे अच्छा नहीं लगता।पहली वार पहाड़ों को मैने तब देखा जब मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था।उस समय हमारे गाँव से एक ट्रक अानंदपुर साहब, कीरतपुर साहब, रोपड़, नंगल डेम अौर नैना देवी की यात्रा के लिए गया था।मैं भी जिद्द करके अपनी दादी के साथ यात्रा पर चला गया।रोपड़ से अागे जाकर जिंदगी में पहली बार छोटे छोटे पहाड़ों के दीदार हुए।यह मेरे लिए बहुत ही रोमांचक पल थे।चार दिन की यह यात्रा मेरे लिए यादगारी हो निबड़ी।तब से ही पहाड़ों से मुहब्बत सी हो गयी।दिल बहुत वार घूमने की बात सोचता लेकिन जाता तो किस के साथ? मंमी डैडी को न ही घूमने का शौक था अौर न ही उनके पास वक्त था।कोई संबंधी भी ऎसा नहीं था जिसके साथ घूमने जा सकता।ऎसे में अपनी इच्छा को मन में ही दबाए रखा।जब मैं +2 में पढ़ता था उस वक्त हमारे कालज का एक टूर दिल्ली, अागरा, मथुरा जैसे स्थानों पर गया।फालतू पैसा (मतलब फीस के बिना का खर्चा) माँगने के मामले में शर्माकल होने के कारण मैने पापा से बात ही नहीं की।खुशकिस्मती से मेरे दसवीं वाले अध्यापक जी मुझे मिल गये अौर एक हजार रुपए देकर बोले 'अाप यह मौका मत छोड़ो बहुत कुछ सीखने को मिलता है एसे टूर पर।अगर अौर रुपए चाहिए तो अौर लेलो।' कालज वालों ने पांच सौ रुपये तो बस किराया भरवाना था और पांच सौ मेरे खर्च करने के लिए काफी थे|मैं उस वक्त अपनी मौसी के पास ही रहता था क्योंकि हमारे गाँव से कालज दूर था अौर बस भी नहीं जाती थी। तो मैं मौसा मौसी को बिन बताए ही टूर पर चला गया।वापस अाया तो पिता जी मिलने अा गए। उन्होने मुझे पैसे दिए अौर अध्यापक साहब को वापिस करने को कहा।उसके बाद भी कई साल तक पहाड़ों की यात्रा का सपना मन में ही दबाना पड़ा।फिर जब हम बी.एड कर रहे थे तब हमने कसौली का एक दिन का ट्रिप प्लान किया।यह मेरा पहला पहाड़ी सफर था जिसके बारे में मुझे पूरा पूरा याद है।उसके अगले साल एक दम हिमाचल की खूबसूरत जगहों में से एक रिकाँग पीअो जाने का मौका मिला।यह मौका मुझे अपने एक किन्नौरी क्लासमेट की कृपा से मिला।उसने गाँव जाते समय जब मुझे अपने साथ चलने को कहा तो मैं खुशी से पागल हो गया।यह सफर मेरे लिए अभूलनीय था।हम पाँच दिन उसके गाँव में रहे। पर मेरे सफर की शुरूअात 2012 में तब हूई जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया।बतौर अध्यापक रैगूलर होने के बाद 2012 में हम नैनीताल, भीमताल अौर रानीखेत यात्रा गए।उसके बाद तो लगातार सफर जारी है।अनेक जगह पर घूमते समय प्राक्रिती को नजदीक से देखने का मौका मिला।वैसे तो सपने कभी पूरे नहीं होते अगर हम एक सपनों को पूरा करते हैं तो दूसरा सपना जन्म ले लेता है।फिर भी दो जगह एसी हैं यहाँ जाकर मुझे लगा कि मैंने एक सपना पूरा कर लिया है।यह दोनों जगह मुझे हमेशा अपनी तरफ खींचती रहती थी अौर अब भी उतनी ही अच्छी लगती हैं।सोते समय सच्चमुच ये जगह सपनों में अाकर मुझे बुलाती रहती थी।मेरे सपनों की पहली जगह थी - छितकुल अौर जब मेरा छितकुल जाने का सपना पूरा हो गया तो मेरे सपनों की जगह बन गइी: चंद्रताल
अब मैं इन दोनों जगह के दीदार कर चुका हूं|अब भविष्य में मेरा सपना 'गुरूदोंगमार झील' को देखने का है।यह सपना तो खैर पता नहीं कब पूरा होगा अब मेरी पहली ड्रीम डेस्टीनेशन के सफर की बात करते हैं।काफी समय पहले पेपर में साँगला घाटी के अंतिम गाँव छितकुल के बारे में जब यात्रा लेख पढ़ा तो मन में वहाँ जाने का सपना संजो लिया।जून 2015 में हम लोगों ने छितकुल जाने का प्रोगराम बना लिया।30 मई को घर से चलना तह हो चुका था लेकिन 29 मई की शाम को एक साथी ने बताया कि किसी सरकारी ड्यूटी की वजह से वोह दो जून को ही जा पाएगा।तो दूसरे दोस्तों ने भी दो जून को जाने की हाँ करदी।लेकिन उस वक्त मेरी श्रीमती प्रेग्नेंट थी अौर डाकटर ने बताया था कि सात जून डिलिवरी की तारीख है।तो मेरे लिए छह जून को हर हालत में घर पर होना चाहिए था।पर दो जून को जाकर वोह लोग नौ या दस जून को वापस अाने वाले थे।मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से वह लोग कम दिन लगाएं।इस लिए मैने छितकुल जाने का फैसला रद्द कर दिया। अपनी ड्रीम डेस्टीनेशन पर ना जा पाने का मन में काफी दुख था।लेकिन दोस्तों के वापिस अाने के बाद ही घर में बेटे का जन्म हूअा अौर इस खुशी में छितकुल न जाने का दर्द भूल गया।उसके बाद मेरा यह सपना पिछले दिसंबर में बिना किसी प्लानिंग के ही पूरा हो गया।क्रिसमिस की छुट्टियों में मैं अकेला मोटरसाइकिल पर पहाड़ों की तरफ निकल गया।पहले दिन मैं साइकलों पर कुफरी जा रहे अपने दोस्तों के साथ जा मिला।वहाँ समशान घाट के पास हम लोग टैंट में रहे।अगली सुबह मेरे दोस्त अपना समान बाँध के शिमला की अोर चल पड़े अौर मैं कंडाघाट से वाया चैल होकर कुफरी निकल गया।दूसरी रात मैने नारकंडा में गुजारी।अभी तक मेरा कोइी प्लान नहीं था कि कहाँ जाउूंगा।मेरे मन में तीर्थन घाटी अौर जलौड़ी जोत जाने का भी विचार था।दूसरा विचार यहाँ से बाघी वगैरा घूमते हूए रोहड़ू जाने का था।अौर तीसरा विचार सराहन जाने का भी था।जब शाम के वक्त मैं हातू पीक पर अकेले बैठा ठंड उतार रहा था (पैग लगा रहा था) तो महिंद्रा 4*4 पर चार पंजाबी लड़के मिले।हातू पर थोड़ी थोड़ी बर्फ पड़ी थी तो लोग बर्फ पर तसवीरें ले रहे थे।उन लड़कों ने मखौल उडाते हूए कहा "अरे! ये इतनी सी बर्फ को देखकर ही फूले नहीं समा रहे।अगर इन्हें छितकुल दिखा दें तो पता नहीं क्या होगा इन लोगों का हाहाहाहा....."
उनकी बात सुनकर मेरे कान खड़े हो गए अौर मैं उठके उन्के पास चला गया।उन्होनें बताया कि वोह स्पिति से अाते वक्त छितकुल होकर अाए हैं।उनकी तस्वीरें देखकर मैं दंग रह गया।हर तरफ बर्फ का सामराज्य था।सड़क पर भी काफी ज्यादा बर्फ थी।सड़क के दोनों किनारों पर तो बर्फ के बड़े बड़े ढेर लगे थे।इन तसवीरों को देखकर मैने छितकुल जाने का फैसला कर लिया।उन लड़कों ने बताया कि साँगला तक तो मोटरसाइकिल चला जाएगा लेकिन अागे मुशकिल है।पर मैने तो पक्का इरादा धार लिया था कि अब तो हर हाल छितकुल जाउूंगा चाहे साँगला से अागे पैदल क्यूं न जाना पड़े।तो अगले दिन मैं नारकंडा से सराहन पहुंच गया।सराहन से दूसरे दिन साँगला को चल पड़ा।किन्नौर द्वार के पास रुक कर किन्नौर की खूबसूरत धर्ती को प्रणाम किया।बसपा अौर सतलुज के संगम कडच्छम डैम में सतलुज के गंधले पानी में बसपा का नीला पानी अा कर मिल रहा अा।यह नजारा बड़ा मनोरम लग रहा था।अागे कुप्पा गाँव से पहले ही चमकती बर्फ नजर अाने लगी जिसका मुझे इंतजार था। बसपा नदी के तट पर खूब बर्फ थी।नदी के पार वाले पहाड़ बर्फ से लदे हूए थे जब कि इस पार कोइी बर्फ नहीं थी।जैसे जैसे अागे बढ़ रहा था बर्फ भी बढ़ रही थी।अब इस तरफ भी सड़क के अास पास थोड़ी थोड़ी बर्फ बिखरी नजर अाने लगी।साँगला पहुंच कर मैने चाय के साथ बिस्कुट खाए।छितकुल की तरफ से अाए एक गाड़ी वाले से अागे के रास्ते के बारे में पूछा कि छितकुल तक बाइक चला जाएगा या नहीं? तो उस ने बताया कि बाइक चला तो जाएगा लेकिन थोडा सावधान रहिएगा।उसकी बात सुनकर मेरा हौंसला अासमान को छूहने लगा।अौर मैं पूरे अात्म विश्वास के साथ छितकुल की तरफ चल पड़ा।एक दो कि.मी. अागे जाकर ही सड़क पर भी बर्फ के दर्शन होने लगे।रक्छम तक जाते जाते सड़क के अास पास अौर नदी के चारों अोर बर्फ ही बर्फ नजर अाने लगी।नजारा इतना खूबसूरत था कि बार बार रुककर देखने को मन करता था।अागे मस्तरंग जाकर अाई.टी.बी.पी की चेक पोस्ट पर रुकने इशारा हूअा तो मैने एकदम ब्रेक मारे।टायर के नीचे बर्फ आने के कारण मेरा बाईक फिसल कर गिरते गिरते बचा।चेक पोस्ट पर खड़े कर्मचारी ने मेरा अाई.डी परूफ माँगा।जब उसने पंजाब का पता पढ़ा तो वोह पंजाबी में बात करने लगा अौर बताया कि वोह भी पंजाबी है अौर उसका नाम सतपाल सिंह है।उस ने पूछा कि इतनी दूर अकेला क्या करने अाया है?तो मैने कहा युंही घूमने और कुदरत के दर्शन करने आया हूँ।वोह बोला "तूं पागल हैं जो इक्कला इथे घुंमण अाया हैं जे पहाड़ ई देखने सी तां शिमला, कुफरी देख लैंदा।एनी दूर जरूर ही अाउना सी।" मैने बताया कि भाई मेरा सपना तो छितकुल देखने का था तो शिमला, कुफरी कैसे घूमता।इतने में उसके लिए चाय अा गइी तो उसने एक कप्प अौर मंगवा लिया।चाय पीते पीते हम लोग बातें करते रहे।फिर सतपाल का धन्यवाद करते हुए मैं अागे चल पड़ा।अब छितकुल दूर नहीं था। तीन कु वजे मैं छितकुल के स्वागती गेट पर पहुंच गया।मैने हातू पीक पर जो तस्वीरें देखी थी उनमें तो गाँव के घरों में अौर होटलों के अाँगन में भी बर्फ थी लेकिन अब वह खुर चुकी थी।पहले तो मैने रानी गैस्ट हाउस में ढाई सौ रुपए में कमरा लिया।ठंड बहुत ज्यादा थी तो मैं ठंड से बचने की दवा अौर खाने पीने का समान लेकर बसपा नदी के तट की अोर चल पड़ा।छितकुल के सरकारी स्कूल का मैदान अौर छतें पूरी तरह बर्फ से ढकी हुई थी।मैं उस वक्त अकेला ही नदी के किनारे था।यहाँ से सरहद्द की अोर के पहाड़ों का जो दृश्य था वह मेरी अाँखों द्वारा देखा गया अब तक का सबसे सुंदर अौर प्यारा दृश्य था।बसपा नदी के अास पास हर तरफ बर्फ की चादर थी।पानी बर्फ के वीच से वह रहा था|इतना शाँत अौर मनमोहक नजारा था कि अाज भी जब वोह पल याद अाते हैं तो लगता है जैसे बसपा के तट पर पहुंच गया हूं।वहाँ मैने बर्फ को इकट्ठी करके एक छोटा सा मेज बना लिया अौर उसके उपर अपनी बोतल अौर खाने का समान रख लिया।फिर दारू में नेचुरल बर्फ डाल कर पैग लगाए।वाह! क्या नजारा था वोह न कोई रोकने वाला न डिस्टर्ब करने वाला।ठंड इतनी बड़ गई कि हाथ अौर नाक-कान सुन्न हो गए।मैं सिर पर टोपी लेना अौर स्वेटर के उपर से गर्म जैकेट पहनना भूल गया था।तो वापिस कमरे में अाकर पहले तो टोपी पहनी अौर फिर जैकेट।अब तक सुर्य छिप चुका था तो मैं कमरे में बैठकर दो पेग लगाकर सरहद्द की तरफ चल पडा।मैने अाखरी ढाबे के बारे कुछ पता नहीं किया था तो सोचा कि हिंदुस्तान का अाखरी ढाबा अागे जाकर बिल्कुल लास्ट प्वाइंट पर होगा।लेकिन वोह अाखरी ढाबे का बोर्ड तो गाँव में प्रवेश करते ही लगा हूअा है अौर यह सिर्फ बोर्ड ही है ढाबा तो बंद हो चुका है।अाते वक्त मेरी नजर इस बोर्ड पर नहीं पड़ी, जिसके कारण मैने सोचा कि सरहद्द की तरफ अाखरी ढाबे पर जाकर ही डिंनर करूंगा।तो ढाबे की तलाश में चलता चलता मैं अाई.टी.बी.पी की चेक पोस्ट पर पहुंच गया।अब तक अंधेरा हो चुका था शायद इस लिए या ठंड के कारण यहाँ नाके पर कोई तायनात नहीं था।बैरिकेड लगा हूअा था लेकिन पेग की वजह से मेरी छटकी हूई थी।मैने सोचा शायद ये बैरिकेड केवल गाड़ियों को रोकने के लिए लगाया है।तो बिनां सोचे मैं बैरिकेड के नीचे से निकल कर अागे चल पड़ा।कोई अादमी तो दूर मुझे रास्ते में कोई जानवर भी नहीं दिखा।हर तरफ शांती अौर सन्नाटा था सिरफ बसपा का शोर इसे भंग कर रहा था।अंधेरे में नीचे एक तरफ कुछ लाइटें जगमगाती नजर अा रही थी।यह सोचकर कि ढाबा वहीं पर होगा मैं अागे बड़ता गया| लेकिन उन लाइटों की तरफ जाने वाला मुझे कोई रास्ता नहीं मिला।दरअसल यह लाइटें तो अाई.टी.बी.पी के कैंपस में जग रहीं थी।शायद यह रानीकंडा का अाई.टी.बी.पी कैंपस था।तो अच्छा ही हूअा लाइटों की तरफ जाने वाला रास्ता न मिला,नहीं तो सीधा उनके दरवाजे पर ही जा कर रुकता।अौर पता नहीं वोह लोग पकड़ते या छोड़ते।खैर अागे जाकर एक लोहे का गेट आ गया जो बंद पड़ा था।लेकिन गेट की साइडों पर कोई रोक नहीं थी तो मैं साइड से निकल कर अागे चल पड़ा।दस कु मिंट तक तो चलता रहा पर आगे जाकर पूरा रास्ता बर्फ से ढका था।मेरे पास तो टार्च भी नहीं थी जिससे अास पास देख सकूं।सिरफ मोबाइल की रोशनी थी।थोडी दूर जाने के बाद न तो रास्ता नजर अा रहा था अौर न ही बर्फ पर किसी के अाने जाने के निशान थे।यहां एक खुला बर्फ का मैदान था।अब मुझे समझ अा चुकी थी कि मैं प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंच गया हूं अौर पी हूई सब उतर गयी।अब तो मन में सिर्फ एक ही इच्छा थी कि सुख शाँती से वापिस होटल पहुंच जाऊं।भूख अौर ढाबा बाबा सब भूल गए।एक ही बात का डर सताने लगा कि अगर अाई.टी.बी.पी वालों ने घुसपैंठिया समझकर पकड़ लिया तो क्या होगा।अब डर के मारे मोबाइल की लाइट भी बंद करदी तांकि अाई.टी.बी.पी वाले दूर से न देखलें।अब वाहो दाही वापिस भागने लगा अौर अंधेरे में बर्फ पर फिसल कर गिर पड़ता, उठता अौर फिर भाग लेता।वापिस लाइटों के पास पहुंचा तो कुत्ते पीछे पड़ गए।अब तो कुत्तों के डर से मिलखा सिंह ही बन गया।इसका फायदा ये हूअा कि मैं कुछ मिंटों में ही बैरिकेड के पास पहुंच गया।बैरिकेड पार करने के बाद ही रुका अौर जब मोबाइल पर समय देखा तो साढे दस वज चुके थे।रात के ग्यारह वजे जब वापस होटल में लौटा तो रसोइया टल्ली होकर सो गया था।भूख से बुरा हाल था अौर खाने के लिए एक खीरा, एक प्याज, थोडे से भुज्जे चने थे।तो उसी से काम चलाना पड़ा।थका होने के कारण बिस्तर पर लेटते ही नींद अा गयी।सुबह सात वजे ही अाँख खुली।टॉयलेट जाने के लिए बाहर बराँडे में एक ढोल पानी का भर कर रखा था।जब मैं पानी का जग भरने के लिए बाहर गया तो ढोल में पानी जम चुका था।एक लोहे की राड से मुश्किल से बर्फ की परत तोड़ी।फिर मैं सुबह सुबह गाँव की सैर करने चल पड़ा।उस वक्त इक्का दुक्का लोगों को छोड़कर सब लोग घरों के अंदर सो रहे थे या ठंड की वजह से बाहर नहीं निकले थे।पहले मैं देवी माथी के मंदिर गया।मंदिर का ताला बंद था अौर भीतर कोई भी नहीं था।मैं दरवाजा खोहल कर अांगन में चला गया।यहाँ आंगन में भी बर्फ थी।गाँव से गुजरते नाले के किनारों पर भी बर्फ की पतली सी पर्त जमी हूइी थी।उपर बौद्ध मंदिर है अौर रास्ते में एक काली माता का मंदिर भी है।इन सब को देखते हूए मैं ऊपर चला गया।अब तक सुर्य भी उदय हो चुका था।धूप अौर छाँव का बड़ा सुंदर नजारा दिख रहा था।ऊपर चोटियों पर धूप चमक रही थी लेकिन गाँव में अभी छांव थी।घाटी का ऎसा नजारा उसके बाद की यात्रियों में कभी देखने को नहीं मिला।वापसी पर मैं गाँव के दूसरे शोर की तरफ चला गया।अब लोग घरों से बाहर निकलने लगे थे।जाते जाते रास्ते में मुझे रुकमणी अाँटी मिल गयी।उसने मुझे काँपते हुए देखा तो अपने घर के भीतर बुला लिया।मैं चुल्ले के पास बैठ कर अाग सेकने लगा।अाँटी ने मुझे गर्म गर्म चाय दी अौर साथ में एक लोकल सवीट डिस दी (नाम भूल गया है)।रात को कुछ नहीं खाया था इस लिए सवीट डिस पर भूखे शेर की तरह टूट पड़ा।बातों बातों में अांटी ने बताया कि वह अकेली ही घर में रहती है।उसका बेटा शिमला में पढ़ता है अौर पति दिल्ली में किसी प्राइीवेट कंपनी में काम करता है।उसने बताया कि गाँव के काफी लोग सरकारी नौकरी करते हैं अौर उनमें से ज़्यादातर अाई.टी.बी.पी में हैं।बाकी के लोग खेती करते हैं अौर कुछ क होटल वगैरह का धंधा करते हैं।चाय पीकर काँपना बंद हूअा तो मैं अाँटी का धन्यबाद करके अागे चल पड़ा।एक छोटे से नाले के साथ चलते हुए मैं गाँव के बाहर पी.डबलयू.डी के रेस्ट हाउस से अागे पहुंच गया।वापिस अपने होटल की तरफ अाते वक्त मैने जब "हिंदुस्तान का अाखरी ढाबा" वाला बोर्ड देखा तो खुद पर ही हंसी अाने लगी।होटल में वापस अाकर देखा तो रसोइया उठ खड़ा था।उस से खाने के बारे में पूछा तो बोला अभी एक घंटे के बाद त्यार होगा।तो उसको सास्रीकाल बोलकर बिना खाना खाए ही अपना सामान बाँधने लगा।जाते जाते एक चाय पीने को दिल किया तो बाहर टहलते हुए चाय पीने लगा।यहीं मुझे हरियाना के बाइकर्स मिले वोह भी स्पिति से अाए थे।उन्होने अपनी तस्वीरें दिखाई तो एक जगह की तस्वीरें देखकर मेरा मन मचल उठा अौर ये जगह थी चंद्रताल।अब उस समय मेरे पास न ही तो इतना प्रबंध था कि चंद्रताल जाने के बारे में सोच सकूं अौर न ही वक्त था।तो मैने मन में नाको तक जाने का प्रोगराम बना लिया।अपने एक सपने को पूरा करके चंद्रताल जाने का नया सपना संजो कर मैं छितकुल से रवाना हो गया।चंद्रताल की यात्रा के बारे में किसी अगली पोसट में लिखूंगा।







पढकर बहोत ही अच्छा लगा
ReplyDeleteबहुत बहुत आभार भाई ❤️❤️
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