19 जून 2018 का दिन है।हम कुटी गांव में पान सिंह के यहां मुर्गियों के खुड्डे जैसे कमरे में पड़े हुए हैं। साढ़े पांच बजे मेरी आंख खुल जाती है लेकिन बाकी लोग अभी भी घोड़े बेच कर सो रहे हैं।हम तकरीबन 3800 मीटर की ऊंचाई पर हैं तो ठंड भी काफी पड़ रही है। पंद्रह बीस मिनट बाद मैं योगी भाई को आवाज देता हूं, 'योगी भाई उठो आदि कैलाश के लिए भी निकलना है।' योगी भाई सुस्ताते हुए और उबासी लेते हुए रजाई से बाहर झांकते हैं। ठंड में बिस्तर से बाहर आने को किस का दिल करता है भला, लेकिन उठना तो पड़ेंगा भैया।तो हम लोग पिछली साइड पर पान सिंह के पास चाय पीने चल देते हैं। बाहर का नजारा हमें मंत्र मुग्ध कर देता है। पीछे कुंती शिखर पर मंडराते बादल स्वर्ग लोक की भांति लग रहे हैं और बर्फ से ढकी ऊंची ऊंची चोटियां देखकर तो लगता साक्षात स्वर्ग ही आंखों के सामने प्रकट हो गया हो। पांडू पर्वत की पांच चोटियों में से दो नज़र आ रही हैं बाकी बादलों के पीछे छिपी हुई हैं। सामने आई टी बी पी का कैंपस है, यहां STD पर कल शाम को टैलीफोन करने वालों की कतार लगी थी। कैंपस के अंदर स्थित मंदिर में से घंटियों की आवाज और भजन सुनाई दे रहे हैं। मैं पब्लिक नल पर जाता हूं यहां झरने के पानी को रोक कर रोजमर्रा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह नल चौबीस घंटे चलता रहता है। मैं बर्फ जैसे ठंडे पानी से मूंह हाथ धोकर पान सिंह के पास चला जाता हूं और उसे बोलता हूं,"पान सिंह भैया चार कड़क चाय बना दो।मीठा रोक के और पत्ती ठोक के रखना।" चाय सच में कड़क बनी है। चाय पीते पीते मैं ऊपर की तरफ टहलने निकल जाता हूं। ऊपर से पूरे गांव का मनभावन दृश्य नज़र आ रहा है। दिल चाहता है कि यहीं बैठकर घंटों तक इस खूबसूरती को निहारता रहूं। लेकिन कड़क चाय की तरह योगी भाई की कड़क आवाज कानों में पड़ती है,"हरजिंदर भाई आगे चलना है कि नहीं? जल्दी आओ।" बची हुई चाय एक ही घूंट में खींच कर मैं कमरे की तरफ खिसक लेता हूं।हम लोग अपना सामान उठाते हैं और आई टी बी पी वालों के पास एंट्री करवा के आदि कैलाश की ओर चल देते हैं। कुछ दूर तक समतल सा रास्ता है और फिर नीचे उतरना होगा। नीचे उतर कर हम कुटी नदी के किनारे किनारे चलने लगते हैं।आई टी बी पी के जवानों की एक टोली हमारे आगे चल रही है। लेकिन जल्दी ही वह इतना आगे निकल जाते हैं कि हमें दिखाई देना बंद हो जाते हैं। आगे चल कर नदी का पुल पार करके हम ऊपर चढ़ने लगते हैं।अब हम ऊपर चल रहे हैं और कुटी नदी नीचे बह रही है।नदी का पानी बादामी रंग का है। रास्ते पर तरह तरह के छोटे छोटे फूल हर कदम पर हमारा स्वागत कर रहे हैं तथा दिल बहला रहे हैं।इन वीरान पहाड़ों पर भोज पत्र के हरे भरे पेड़ बहुत ही खूबसूरत लग रहे हैं। अब मौसम खुल गया है तो पांडू पर्वत की पांचों चोटियां नज़र आने लगी हैं। नाश्ता नहीं किया था इसीलिए अब भूख लगने लगी है। एक खूबसूरत जगह पर रुक कर मैं साथियों का इंतजार करने लगता हूं क्योंकि खाने का चार्ज जोशी जी के पास है।जब तक जोशी जी नहीं आते यहीं रुकना पड़ेगा।खाने का सामान उन्हीं के पास है न। आखिर जोशी जी पहुंच जाते हैं।हम लोग एक चट्टान पर बैठ कर साथ लाए बिस्कुट और पापड़ से (नाम भूल गया) खा कर पेट की आग शांत करते हैं। चलते चलते हमारी मुलाकात आई टी बी पी के जवान से होती है।वह भीलवाड़ा से है और उसका नाम महेश मीणा है। मैं और महेश चलते चलते आगे निकल जाते हैं।वह इस वीरान और दुर्गम क्षेत्र में आकर बहुत दुखी है। उसका दर्द सुनो," साली क्या नौकरी है यार, छह छह महीने तक बच्चों और घर वाली चेहरा नहीं देख सकते।सब रिश्ते नाते चकनाचूर हो गये।न किसी शादी की खुशी शामिल हो सकते हैं और न किसी की मौत का दुख बांटने जा सकते हैं।साला इतना सारा त्याग करने के बाद भी जब रिटायर होंगे तो मिलेगा बाबा जी का ठुल्लू। पापी पेट की मजबूरी है वरना यहां इन वीरान पहाड़ों में किसका दिल करता है रहने को।" तकरीबन आधे रास्ते में एक ढाबा आता है।इस जगह का नाम क्यांचती धार है। यहीं से आदि कैलाश के प्रथम दर्शन भी होते हैं अगर मौसम साफ़ हो। हमें भी कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं लेकिन उस वक्त तक हमें पता ही है कि यहीं आदि कैलाश है।आज ढाबा भी बंद पड़ा है। यह ढाबा कुटी वाले पान सिंह के बड़े भाई पुष्कर सिंह का है। यहां पर पांच सात आदमी रात को ठहर भी सकते हैं। और उनके तीसरे भाई मान सिंह का ढाबा ज्योलिंकौंग में है।हम लोग आगे चलते रहते हैं। रास्ते में महेश भाई मुझे शेषनाग पर्वत और गणेश पर्वत भी दिखाता है। फिर एक तीखी चढ़ाई के बाद चार किलोमीटर से ही ज्योलिंकौंग में आई टी बी पी का कैंपस दिखने लगता है।एक जगह घास का खूबसूरत मैदान है और वहां एक घोड़ा घास चर रहा है। यहां छोटे-छोटे रंग बिरंगे फूल खिले हैं। इस जगह की खूबसूरती मुझे रुकने पर मजबूर कर देती है। मैं यहां फोटो खींचने लगता हूं और महेश आगे निकल जाता है। यहां मैं खूब फोटो खींचता हूं और घास पर लेट कर आराम करता हूं और फिर आगे चल देता हूं। कुछ दूर जाकर आगे नकड़च्यू नाला है। रास्ता अच्छा बना हुआ है। रास्ते के आस पास लोहे की रेलिंग लगी हुई है। यह रेलिंग वाला रास्ता सीधा नीचे नाले में उतर जाता है। ज्यादा लोग यहीं मार खा जाते हैं वह इस रेलिंग वाले रास्ते से नीचे उतर जाते हैं जबकि नीचे नाले पर अभी पुल नहीं बना है।पुल तो काफी आगे है जिसके लिए ऊपर से ही एक पगडंडी बाएं हाथ मुड़ जाती है। यहां आकर मैं भी मार खा जाता हूं सीधा नीचे उतर जाता हूं। नीचे जाकर देखता हूं कि पुल का काम अधूरा छोड़ रखा है। नाले के दोनों तरफ दीवारें तो खड़ी कर दी हैं लेकिन ऊपर पुल बनना अभी बाकी है।"अब किधर से नाला पार करूं" मैं सोच में पड़ जाता हूं। कोई रास्ता नहीं दिख रहा। मैं नाले के किनारे किनारे चल कर ऐसी जगह तलाश करने लगता हूं यहां पानी कम हो और मैं नाला पार कर सकूं। पानी की दो धाराओं में से एक को तो मैं जैसे तैसे पार कर लेता हूं लेकिन मुख्य धारा को पार करने का रास्ता नहीं मिल रहा। मैं दोनों धाराओं के बीच इधर उधर भटक रहा हूं कि नाले के पार ऊपर से मुझे किसी के सीटी बजाने की आवाज सुनाई देती है।जब मैं ऊपर देखता हूं तो महेश भाई मुझे इशारे कर कुछ समझाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनके इशारों से भी मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मैं कभी इस तरफ जाता हूं तो कभी उस तरफ। वो मेरी बाईं ओर इशारा करते हैं मैं बड़े बड़े पत्थरों के ऊपर चलता हुआ उधर जाता हूं। आगे पानी की दोनों धाराएं एक हो गई हैं। मैं पीछे मुड़कर देखता हूं महेश भाई सीटी पर सीटी बजा रहे हैं और पीछे मुड़ने का इशारा कर रहे हैं। मैं मैंटली तौर पर इतना टार्चर हो गया हूं कि लगता है यहीं पत्थरों पर लेट जाऊं।मगर यहां से निकलना तो पड़ेगा ही। मैं नाले के ठंडे ठंडे पानी की दो बोतल भरके अपने सिर में डालता हूं।अब थोड़ा रिलेक्स महसूस हो रहा है। मैं रुक कर महेश भाई के इशारे को अच्छी तरह देखता हूं।अब समझ में आ गया वो क्या कहना चाह रहे हैं। मैं वापस नाले के किनारे पर आता हूं और फिर किनारे किनारे बाईं तरफ चलने लगता हूं। बड़े बड़े पत्थर फिर से हिम्मत तोड़ रहे हैं लेकिन मैं आगे बढ़ना जारी रखता हूं। कुछ आगे जाकर छोटा-सा पुल दिखाई देने लगा है।पुल पर रुक कर मैं सामने आधे अधूरे दिख रहे ब्रह्मा पर्वत की खूबसूरती को निहारने लगता हूं।इस पर्वत की तलहटी में जो ग्लेशियर दिख रहा है, वहीं से नकड़च्यू नाले का जन्म होता है। पुल पार करके मैं नाले के दूसरे छोर पर चलता चलता वहीं अधूरे पुल के पास पहुंच जाता हूं।इस पुल को ढूंढते ढूंढते मानसिक रूप से सच में टूट गया हूं।इतना पूरे सफर ने नहीं थकाया जितना इस नाले को पार करने में थक गया हूं।आई टी बी पी वाले महेश भाई का धन्यवाद करके मैं वहीं रुक जाता हूं तांकि मेरी तरह मेरे साथियों को परेशानी न हो। कुछ समय बाद योगी भाई आते दिखाई देते हैं। मैं उन्हें आवाज देता हूं कि नीचे मत उतरो बाएं हाथ वाला रास्ता पकड़ो।वह ऐसा ही करते हैं और मेरे पास पहुंच जाते हैं।हम दोनों बैठे बातें कर रहे हैं कि दो आदमी अपनी खच्चरों के साथ यहां आते हैं। उनमें से एक खच्चर पर लटक कर नाला पार कर लेता है और दूसरा पुल की तरफ चल देता है। इतने में कोठारी सर भी पहुंच जाते हैं और हम उन्हें पुल का रास्ता बता देते हैं। वो भी सही रास्ता पकड़ कर पुल पर पहुंच जाते हैं।अब हमारे चौथे साथी जोशी जी रह गए हैं। मैं और कोठारी सर योगी भाई को वहीं बिठा कर चल पड़ते हैं।ऊपर एक खुला मैदान सा है यहां पर जगह जगह पत्थर खिलरे पड़े हैं जैसे पुराने मकानों के खंडहर हों।पता चला कि इस जगह पर कभी बड़ा बाजार हुआ करता था, जिसे नकड़च्यू मंडी कहते थे। 1962 की जंग से पहले नकड़च्यू मंडी के माध्यम से ही चीन से व्यापार होता था।मांगस्या और लिम्पया दर्रों के माध्यम से लोग दारचिन जाते थे और वहां से सामान नकड़च्यू मंडी पहुंचता था। फिर आगे यहां से गुंजी, बुद्धि और बाकी गांवों तक सामान पहुंचता था।अब चीन जाने का यह रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया गया है तो लोग लिपुलेख दर्रा पार करके चीन जाते हैं।इधर हम ज्यौलिकौंग की तरफ बढ़ रहे हैं उधर योगी भाई द्वारा आवाजें देने और बार बार इशारे करने पर भी जोशी जी सीधा नीचे उतर जाते हैं। उम्र दराज होने के कारण वहां पर ऐसा टार्चर होते हैं कि एक घंटा पुल तक पहुंचने में लग जाता है। मैं और कोठारी सर आई टी बी पी के कैंपस में पहूंच जाते हैं। वो पूछते हैं कि कुटी से तो आप चार लोग निकले थे बाकी दो किधर हैं।हम बताते हैं कि वह पीछे हैं और हमारा इंनरलाइन पास भी उन्हीं के पास है तो एंट्री वोही करा देंगे। इतने में बारिश शुरू हो जाती है। रहने का जुगाड अभी आधा किलोमीटर आगे है।अब रेन सूट क्या निकालना मैं नीचे नजर आ रहे KMVN के यात्री निवास और ढाबों की तरफ दौड़ लेता हूं ताकि भीगने से पहले वहां पहुंच सकूं। लेकिन फिर भी भीग तो जाता ही हूं। मैं सीधा KMVN की रसोई में घुस जाता हूं और वहीं पर रहने और खाने के बारे में पूछता हूं।वह पांच सौ रुपए प्रति व्यक्ति बताता है।अरे इतना महंगा भाई। वो सलाह देता है कि पास वाले ढाबे में रुक जाओ सस्ता पड़ेगा। अब बारिश थम चुकी है। कोठारी जी भी आ गये हैं। मैं एक लड़के से मान सिंह के ढाबे के बारे पूछता हूं। वो बताता है कि यह मान सिंह का ही ढाबा है।पान सिंह के पास हम दो सौ रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से रुक जाते हैं।
यहां दूर दूर तक समतल सा मैदान है जैसे हरी चादर बिछी हुई हो।पास से ही गौरी नदी शांति से बहती हुई नीचे जाकर कुटी नदी में समा जाती है। पहले योगी भाई और उनके पंद्रह बीस मिनट बाद जोशी जी आते हैं।मान सिंह ने ढाबे को अच्छी तरह मैंटेन कर रखा है। पहले रसोई है बीच में डाइनिंग हॉल है और फिर हमारे वाला कमरा।हम चाय पी रहे होते हैं कि तेज बारिश शुरु हो जाती है।हम लोग अपना सामान अंदर ले जाते हैं और रजाई ओढ़ कर चाय पीने लगते हैं। गर्म गर्म चाय की चुस्कियां लेते हुए हम गौरी कुंड और पार्वती सरोवर जाने के बारे में चर्चा करते हैं। कोठारी सर और जोशी जी साफ़ बोल देते हैं कि अब और चलने हिम्मत नहीं है आप लोग गौरी कुंड जा आओ। पार्वती सरोवर सुबह साथ साथ चलेंगे।
बारिश थमने पर हम गौरी कुंड की दूरी पता करते हैं। एक आदमी तीन किलोमीटर और दूसरा दो किलोमीटर बताता है। मैं और योगी भाई टार्च वगैरह लेकर गौरी कुंड की तरफ चल देते हैं।गौरी कुंड आदि कैलाश पर्वत की बिल्कुल तलहटी में स्थित है। गौरी नदी इसी गौरी कुंड से छोटे से झरने के रूप में जन्म लेती है। चारों ओर बादल छाए हुए हैं। हमें नहीं पता आदि कैलाश पर्वत कैसा दिखता है। चलते चलते हम काफी ऊपर पहुंच जाते हैं।मेरा सिर दर्द करने लगा है। ठंड भी जबरदस्त है यहां। पानी पीकर हम फिर आगे बढ़ते हैं। एक चट्टान के शिखर पर हमें कुछ लड़के खड़े दिखाई देते हैं।वह गौरी कुंड के पास से गुजर कर ऊपर खड़े हैं।हम लोग ऊपर जाने की बजाय नीचे गौरी कुंड की तरफ उतर जाते हैं।झील के आसपास बर्फ नज़र आ रही है। ऊपर तो बर्फ के अंबार लगे हैं।झील में आस पास की बर्फानी चोटियों का दिलकश नज़ारा देख कर मैं सब कुछ भूल जाता हूं। पहले मैं सिर दर्द से कराह रहा था लेकिन अब सब कुछ नार्मल है। लगता है जन्नत में आ गए हैं। यहां एक त्रिशूल जड़ा हुआ है जिसके नीचे लोगों ने दस दस के नोट और बहुत से सिक्के रखे हुए हैं।हम फोटो खींच रहे होते हैं कि ऊपर वाले लड़के खुशी से चिल्लाने लगते हैं।वह बम्म बम्म भोले के जयकारे लगाते हुए कह रहे हैं आदि कैलाश दिखने लगा आदि कैलाश दिखने लगा।हम भी एक तरफ शिवलिंग जैसी दिख रही आकृति को देखकर फोटो लेने लगते हैं।असल में यह आदि कैलाश नहीं है। यह तो ऐसे ही बर्फ से ढके पहाड़ का एक हिस्सा नज़र आ रहा है। इसका पता हमें अगली सुबह चलता है जब आदि कैलाश पर्वत को देखते हैं।खून जमा देने वाली ठंड में यहां ज्यादा देर नहीं रुका जा सकता तो हम वापस मान सिंह के ढाबे की ओर चल देते हैं। वापस लौटने तक अंधेरा हो चुका है। कुछ समय आराम करने के बाद खाना तैयार हो जाता है।आज पूरे सफर का सबसे बढ़िया खाना मिलने वाला है।हम डाइनिंग हॉल में लगे मेज के आसपास बैठ जाते हैं।मान सिंह सबसे पूछ रहा है "कोई कमी तो नहीं है ना।ये गर्म चपाती लीजिए सर। मैडम आपको और चावल डालूं क्या? ओए अंदर से गर्म सब्जी लेके आ। कुछ और चाहिए तो बता देना सर।" दरअसल उस दिन एक सरकारी अधिकारी और गुंजी की प्रधान मैडम इधर ही रुके हुए हैं। शायद इसीलिए इतना बढ़िया ट्रीट हो रहा है। हमें क्या हमारा काम हो गया अब। लकड़ी के संग लोहा भी तर गया मतलब प्रधान और अधिकारी के साथ हमें भी मजेदार खाना मिल गया। बाकी कहानी फिर कभी
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| सामने गणेश पर्वत नज़र आ रहा है |
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| नकड़च्यू नाले के इस पुल को ढूंढने में टूट गया था |
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| गौरीकुंड और पानी के भीतर नजर आता बर्फीले पहाड़ों का छाया |
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| गौरी कुंड का एक और हुसीन नजारा |
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| इसको ही हमने आदि कैलाश समझ लिया था |
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| यह नकड़च्यू नाला दुश्मन बन गया था |
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| पांडू पर्वत की पांचों चोटियां |
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| यहां होती थी नकड़च्यू मंडी और सामने बादलों में घिरा ब्रह्मा पर्वत |
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| पेट की आग बुझानी भी जरूरी है |
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| एक झरने के पास मैं |
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| मैं योगी भाई और कोठारी सर के साथ बिस्कुट खाते समय |
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| नकड़च्यू मंडी के खंडहर |
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| योगी भाई गौरी कुंड पर |
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| नकड़च्यू मंडी के अवशेष |
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vry nice bai...
ReplyDeleteThanks dear Bikram
Deleteकया बात है नूपे....
ReplyDeleteਠੈਂਕੂ ਨਿੱਕਿਆ
DeleteBahut vadiya bai
ReplyDeleteਧੰਨਵਾਦ ਬਾਈ ਵਿੱਕੀ
Deleteयहाँ जो भी आ रहा था पहली बार उसे मुश्किल आ रही थी रास्ता ढूंढने में लेकिन आपने मुझे, मैंने जोशी जी को और फिर गुंजी की प्रधान और उनके बेटे को रास्ता बताया था ! वहां पुल के लिए निशान न लगाना एक बड़ी गलती है , कोई भी व्यक्ति उसी रास्ते पर जाएगा जिस पर अधूरा पुल बनाया हुआ है और वहीँ वो फस जाता है !! गुंजी की प्रधान का नाम "नीलम गुंज्याल " और उनके पुत्र का नाम शुभम गुंज्याल था भाई !!
ReplyDeleteधन्यवाद योगी भाई बस मार्गदर्शन करते रहिएगा
Deleteबहुत जबरदस्त लिखा है भाई और फोटो तो बहुत ही खूबसूरत !!
ReplyDeleteयात्रा बीच से क्यों लिखी भाई...
ReplyDeleteआरम्भ से लिखो
और हाँ सेटिंग में जाकर ब्लॉग का समय भारतीय मानक अनुसार सही कर लो,
Deleteजैसे मैं यह कमेंट सुबह 09 बजकर 40 मिनट पर लिख रहा हूँ ये बता कुछ और रहा है।
नया नया लिखना शुरू किया है मालिक मारगमार्गद के लिए धन्यवाद 🙏🏼
Deleteअसल में मैंने सिर्फ एक फोटो के बारे में लिखना शुरू किया था बाद में स्पीड पकड़ ली और पूरा लिख दिया
DeleteBahut badhiya Anoop bhai
ReplyDeleteधन्यवाद प्रवेश भाई
DeleteNiceeeeeee
ReplyDeleteThanks dear
Deleteबहुत ही बढ़िया जानकारी और यात्रा
ReplyDeleteशुक्रिया गौरव भाई
DeleteBahut badiya harjindra bhai
ReplyDeleteधन्यवाद जावेद भाई
Deleteभाई ब्लॉग की पोस्ट थोड़ी लंबी हो गयी लेकिन लिखा बढ़िया है....बस बीच से पढ़ा इसलिए आगे पीछे की बात से में लिंक नही कर पाया...बढ़िया पोस्ट
ReplyDeleteThanks bhai ❤️❤️
Deleteलंबी कैसे हो गई ये तो मुझे भी पता नहीं चला।बीच में इसीलिए लिख दी क्योंकि मैंने सिर्फ एक फोटो के बारे में जानकारी लिखनी शुरू की थी वटसएप ग्रुप में डालने के लिए।पर वोह जब लंबी हो गई तो मैंने सोचा उस दिन का पूरा ब्यौरा लिख कर ही डाल देता हूं
Excellent
ReplyDeleteThanks dear bro
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