सराहन की एक खूबसूरत याद
दिसंबर का आखिरी हफ्ता चल रहा है और सोलो राईड के दौरान मैं सराहन में पहुंच चुका हूं। मैं होटल या व्यवसायिक कमरे की जगह किसी साधारण घर में कमरा लेना चाहता हूं ताकि लोगों के काम धंधे और रहन सहन को पास से देख सकूं। लेकिन कोई भी मुझे अपने घर में ठहराने के लिए तैयार नहीं होता। फिर एक होटल में कमरा लेना पड़ता है।सामान कमरे में रख कर भीमाकाली मंदिर में प्रस्थान करता हूं और बाजार से कुछ सामान खरीदता हूं जैसे स्लाद, नमकीन, उबले अंडे और अंडों की भुर्जी। फिर कमरे से दारू की बोतल उठाता हूं और सराहन से आगे की तरफ चल पड़ता हूं। मुझे नहीं पता यह रास्ता कहां जाएगा पर मुझे जान कर लेना भी क्या है यदि रास्ता इतना सुंदर और शांति है। कुछ दूर जाकर रंगोरी गांव आता है। यहां बच्चे स्कूल में क्रिकेट खेल रहे हैं। मुझे देख कर वोह सब इकट्ठे हो कर मेरे पास आ जाते हैं। मैं भी उनके साथ क्रिकेट खेलने लगता हूं लेकिन बिना रन बनाए तीसरी गेंद पर आउट हो जाता हूं।बच्चे मुझे आऊट करके बहुत खुश होते हैं।रंगोरी से आगे रास्ता काफी खराब है। आगे तीखी उतराई है। एक छोटे से झरने के पास रुक कर मैं बैठ जाता हूं और अकेले ही महफ़िल सजा लेता हूं।अगला गांव कुर्गू है खूबसूरत घाटी में वसा हुआ। आगे शायद किन्नू के लिए सीधे रास्ते का काम चल रहा है। बड़े बड़े पत्थर और खड्डे हैं रास्ते पर। अब अंधेरा होने लगा है लेकिन मैंने तो घर की देशी के तीन चार छटके हुए हैं तो मुझे क्या फर्क पड़ता है। मुझे तो घाटी में नज़र आ रहे छोटे से खूबसूरत गांव जा कर वापस मुड़ना है। एक जगह बाइक रोक कर जब मैं पैग लगाकर मस्त बैठा हूं तो एक गंदे और मैले कपड़ों वाला आदमी मेरे पास आता है। वोह मुझसे पूछने लगता है कि कहां से आए हो और इस अंधेरे में किधर जा रहे हो? असल में उसे मेरी दारू की गंध आ जाती है और वो पूरे दिन का थका हुआ है।उसे उम्मीद है कि मैं उसे एक दो पैग लगवा दूंगा।उसका नाम रत्न है और वोह उत्तराखंड के बागेश्वर के किसी गांव का रहने वाला है।वह एक पेंटर है और यहां काम की तलाश में आया है ।भले ही उसका नाम रत्न है पर उसकी हालत कोयले से भी बदतर है। काम कोई खास नहीं मिलता, दो वक्त का निवाला भी बड़ी मुश्किल से कमाता है। वोह तीन भाई हैं और रत्न सबसे बड़ा है। रत्न से छोटा अपने गांव में छोटी मोटी दुकान चलाता है जबकि सबसे छोटा पढ़ाई के साथ गाइड का काम करता है। रत्न दारू पीने का पूरा शौकीन है शायद उसका यहीं शौक आगे जाकर मेरे लिए वरदान साबित होने वाला है। वोह शर्माते शर्माते मुझसे एक पैग की मांग करता है। मेरी आदत है कि मैं घर से ही अपने लिए देशी घर की साथ लेकर चलता हूं। मैं रत्न भाई को अपने हिसाब से एक पैग डालके देता हूं और साथ में नमकीन भी। मैं उसे बताता हूं कि मैं नुचे घाटी में नज़र आ रहे उस गांव तक जाना चाहता हूं। वोह बताता है कि उस गांव का नाम पृथ्वी है और वहां इधर से कोई रास्ता नहीं जाता सिर्फ पगडंडी जाती है। फिर हम दोनों पृथ्वी गांव की तरफ एक पगडंडी पर चलने लगते हैं। पांच मिनट बाद ही रत्न भाई की जुबान पर दारू का असर दिखाई देने लगता है। सिर्फ एक ही पैग से उसका बोलने का अंदाज बदल जाता है और पांव भी थोड़ा थोड़ा डगमगाने लगते हैं।हम लगभग डेढ़ घंटा चलते रहते हैं लेकिन किसी मुकाम पर नहीं पहुंचते। मैं रत्न से पूछता हूं कि क्या उसे पक्का यकीन है कि हम सही जा रहे हैं। वोह कहता है कि मैं तो माउंट एवरेस्ट तक सही सलामत ले जाऊं इसकी तो बात ही कुछ नहीं। फिर वोह और दारू पीने को कहता है लेकिन मैं साफ इंकार कर देता हूं।वोह बहाना बनाता है कि ऐसे तो उससे चला भी नहीं जाएगा। मैं उसे साफ कह देता हूं कि अगर नहीं चल सकता तो यहीं पर रुकजा मैं तो चलता हूं।दो चार मिनट के बाद रत्न खुद ही मेरे पीछे चला आता है। अब हम कुछ दूर एक लाईट जगती देखते हैं और उसी तरफ चल पड़ते हैं। वहां जाकर धूणी पर आग सेकते हैं और घर वाले अंकल जी से बताते हैं कि हम तो ऐसे ही पृथ्वी गांव को जा रहे हैं। वोह बताते हैं कि पृथ्वी का रास्ता तो काफी पीछे छोड़ आए आप लोग। रत्न भाई अंकल से दारू मांगता है लेकिन मेरे कहने पर अंकल इंकार कर देते हैं। अब हम बाइक तक जाने का रास्ता पूछते हैं। अंकल काफी दूर तक हमें छोड़ कर जाते हैं और फिर रास्ता अच्छी तरह से समझाकर वापस लौटते हैं।तकरीबन साढ़े दस बजे हम लोग वापस सराहन वाले मुख्य रास्ते पर पहुंच जाते हैं। लेकिन बाइक से दो ढाई किलोमीटर दूर। फिर बाइक के पास जाते हैं और बैठकर पैग लगाने लगते हैं। चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है। सिर्फ हम दो लोग हैं जो रात्रि की शांति को भंग कर रहे हैं नहीं तो हर चीज रुकी सी हुई है। अब हम वापस चलते हैं लेकिन बड़े बड़े पत्थर, अंधेरा, छोटी बाइक और तीखी चढ़ाई दुश्मन बन जाते हैं। इस वक्त रत्न भाई बड़े काम आते हैं। वोह पीछे से धक्का लगाते हैं और आगे से पत्थर भी हटाते हैं। पत्थरों वाला दो किलोमीटर का रास्ता ऐसे ही पार होता है। आगे रास्ता ठीक ठीक आ जाता है लेकिन फिर भी कहीं कहीं रत्न भाई को धक्का लगाना पड़ता है। रत्न भाई कहते हैं कि इतनी मेहनत के बाद एक पैग तो बनता है भइया। वापसी पर हम फिर उसी झरने पर रुकते हैं यहां जाते समय मैं अकेला रुका था। यहां बैठकर मैं स्लाद चीरता हूं और बचे हुए उबले अंडे छीलता हूं। यहां हम सारा सामान चटम कर देते हैं और बोतल भी खाली करके फेंक देते हैं। अब रत्न पूरा टैट हो गया है। वोह मुझे कहता है 'भैया मुझे भी पंजाब ले चलो अपने साथ। मैं आपके खेतों को पानी दूंगा और पशूयों की भी देख रेख करूंगा। मुझे कोई पैसा भी नहीं चाहिए बस कपड़े और रोटी दे दिया करना।शाम को ऐसी दारू के तीन पैग बस।' रंगोरी आ कर वोह कहता है मैं यहीं रहता हूं। वोह जिद्द करके मुझे अपने कमरे में ले जाता है। उसके पास ठेके की दारू का एक पैग बचा है।उसे हम लवली करके मतलब एक बार डालकर आधा आधा पी जाते हैं। जाते वक्त रत्न मुझसे मोबाइल नंबर लिखा कर लेता है और पंजाब आकर मुझसे संपर्क करेगा ऐसा कहता है। फिर हम दो भाई अलग हो जाते हैं। रात को बारह बजे मैं होटल में पहुंचता हूं और आते ही सो जाता हूं।




Comments
Post a Comment